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Wednesday, 3 October 2012

तुम बसी हो कण कण अंदर माँ (वीडियो)

Archana Singh 2paltak - 01:46
तुम बसी हो कण कण अंदर माँ,

हम ढुढंते रह गये मंदिर में.

 हम मूढमति हम अज्ञानी,

माँ सार तुम्हारा क्या जाने.


सावन की रुत हैं आ जा माँ

Archana Singh 2paltak - 00:30
सावन की रुत हैं जा माँ
सावन की रुत हैं जा माँ, हम झूला तुझे झूलायगें
फूलों से सजायेंगे तूझको, मेंहदी हाथों में लगायेंगे....
सावन की रुत हैं जा माँ……





कोई भेंट करेगा चुनरी, कोई पहनायेगा चूडी,
माथे पे लगायेगा माँ, कोई भक्त तिलक सिंदूरी,
कोई लिये खडा है पायल, लाया है कोई कंगना,
जिन राहों से आयेंगी माँ तू भक्तों के अंगना,
हम पलके वहाँ बिछायेंगे ...
सावन की रुत हैं जा माँ……
माँ अंबुवा की डाली पे झूला भक्तों ने सजाया,
चंदन की बिछाई चौकी, श्रद्धा से तूझे बुलाया,
अब छोड ये आखँ मिचौली, जा मैया भोली,
हम तरस रहे है कब से सुनने को तेरी बोली,
कब तेरा दर्शन पायेंगे ....
सावन की रुत हैं जा माँ……
लाखों है रुप माँ तेरे चाहे जिस रुप में जा,
नैनों की प्यास बुझा जा बस एक झलक दिखला जा,
झूले पे तुझे बिठा के तूझे दिल का हाल सुनाके,
फिर मेवे और मिश्री का तुझे प्रेम से भोग लगाके
तेरे भवन पे छोड के आयेगे ......
सावन की रुत हैं जा
सावन की रुत हैं जा माँ, हम झूला तूझे झूलायगें हैं
फूलों से सजायेंगे तुझको, मेंहदी हाथों में लगायेंगे....
सावन की रुत हैं जा

Monday, 1 October 2012

चापलूस मंडली

Archana Singh 2paltak - 19:00
जंगल में एक शेर रहता था। उसके चार सेवक थे चील, भेडिया, लोमडी और चीता। चील दूर-दूर तक उडकर समाचार लाती। चीता राजा का अंगरक्षक था। सदा उसके पीछे चलता। लोमडी शेर की सैक्रेटरी थी। भेडिया गॄहमंत्री था। उनका असली काम तो शेर की चापलूसी करना था। इस काम में चारों माहिर थे। इसलिए जंगल के दूसरे जानवर उन्हें चापलूस मंडली कहकर पुकारते थे। शेर शिकार करता। जितना खा सकता वह खाकर बाकी अपने सेवकों के लिए छोड जाया करता था। उससे मजे में चारों का पेट भर जाता।

एक दिन चील ने आकर चापलूस मंडली को सूचना दी  “भाईयो! सडक के किनारे एक ऊँट बैठा हैं।”

भेडिया चौंका  “ऊँट! किसी काफिले से बिछुड गया होगा।”

 चीते ने जीभ चटकाई  “हम शेर को उसका शिकार करने को राजी कर लें तो कई दिन दावत उडा सकते हैं।”

लोमडी ने घोषणा की  “यह मेरा काम रहा।”

लोमडी शेर राजा के पास गई और अपनी जुबान में मिठास घोलकर बोली  “महाराज, दूत ने खबर दी है कि एक ऊँट सडक किनारे बैठा हैं। मैंने सुना हैं कि मनुष्य के पाले जानवर का मांस का स्वाद ही कुछ और होता हैं। बिल्कुल राजा-महाराजाओं के काबिल। आप आज्ञा दें तो आपके शिकार का ऐलान कर दूं?”

शेर लोमडी की मीठी बातों में आ गया और चापलूस मंडली के साथ चील द्वारा बताई जगह जा पहुंचा। वहां एक कमजोर-सा ऊँट सडक किनारे निढाल बैठा था। उसकी आँखें पीली पड चुकी थीं। उसकी हालत देखकर शेर ने पूछा “क्यों भाई तुम्हारी यह हालात कैसे हुई?”

ऊँट कराहता हुआ बोला  “जंगल के राजा! आपको नहीं पता इंसान कितना निर्दयी होता हैं। मैं एक ऊँटो के काफिले में एक व्यापार का माल ढो रहा था। रास्ते में मैं बीमार पड गया। माल ढोने लायक नहीं उसने मुझे यहां मरने के लिए छोड दिया। आप ही मेरा शिकार कर मुझे मुक्ति दीजिए।”

ऊँट की कहानी सुनकर शेर को दुख हुआ। अचानक उसके दिल में राजाओं जैसी उदारता दिखाने की जोरदार इच्छा हुई। शेर ने कहा  “ऊँट, तुम्हें कोई जंगली जानवर नहीं मारेगा। मैं तुम्हें अभय देता हूं। तुम हमारे साथ चलोगे और उसके बाद हमारे साथ ही रहोगे।”

चापलूस मंडली के चेहरे लटक गए।

भेडिया फुसफुसाया “ठीक है। हम बाद में इसे मरवाने की कोई तरकीब निकाल लेंगे। फिलहाल शेर का आदेश मानने में ही भलाई हैं।”

 इस प्रकार ऊँट उनके साथ जंगल में आया। कुछ ही दिनों में हरी घास खाने व आरम करने से वह स्वस्थ हो गया। शेर राजा के प्रति वह ऊँट बहुत कॄतज्ञ हुआ। शेर को भी ऊँट का निस्वार्थ प्रेम और भोलापन भाने लगा। ऊँट के तगडा होने पर शेर की शाही सवारी ऊँट के ही आग्रह पर उसकी पीठ पर निकलने लगी लगी वह चारों को पीठ पर बिठाकर चलता।

एक दिन चापलूस मंडली के आग्रह पर शेर ने हाथी पर हमला कर दिया। दुर्भाग्य से हाथी पागल निकला। शेर को उसने सूंड से उठाकर पटक दिया। शेर उठकर बच निकलने में सफल तो हो गया, पर उसे चोंटें बहुत लगीं। शेर लाचार होकर बैठ गया। शिकार कौन करता? कई दिन न शेर  ने कुछ खाया और न सेवकों ने। कितने दिन भूखे रहा जा सकता हैं?

लोमडी बोली  “हद हो गई। हमारे पास एक मोटा ताजा ऊँट हैं और हम भूखे मर रहे हैं।”

चीते ने ठंडी साँस भरी  “क्या करें? शेर ने उसे अभयदान जो दे रखा हैं। देखो तो ऊँट की पीठ का कूबड कितना बडा हो गया हैं। चर्बी ही चर्बी भरी हैं इसमें।”

 भेडिए के मुंह से लार टपकने लगी  “ऊँट को मरवाने का यही मौका हैं दिमाग लडाकर कोई तरकीब सोचो।”

लोमडी ने धूर्त स्वर में सूचना दी  “तरकीब तो मैंने सोच रखी हैं। हमें एक नाटक करना पडेगा।”

सब लोमडी की तरकीब सुनने लगे। योजना के अनुसार चापलूस मंडली शेर के पास गई। सबसे पहले चील बोली  “महाराज, आपको भूखे पेट रहकर मरना मुझसे नहीं देखा जाता। आप मुझे खाकर भूख मिटाइए।”

 लोमडी ने उसे धक्का दिया  “चल हट! तेरा मांस तो महाराज के दांतों में फँसकर रह जाएगा। महाराज, आप मुझे खाइए।”

 भेडिया बीच में कूदा  “तेरे शरीर में बालों के सिवा हैं ही क्या? महाराज! मुझे अपना भोजन बनाएँगे।”

अब चीता बोला  “नहीं! भेडिए का मांस खाने लायक नहीं होता। मालिक, आप मुझे खाकर अपनी भूख शांत कीजिए।”

 चापलूस मंडली का नाटक अच्छा था। अब ऊँट को तो कहना ही पडा  “नहीं महाराज, आप मुझे मारकर खा जाइए। मेरा तो जीवन ही आपका दान दिया हुआ है। मेरे रहते आप भूखों मरें, यह नहीं होगा।”

चापलूस मंडली तो यहीं चाहती थी। सभी एक स्वर में बोले  “यही ठीक रहेगा, महाराज! अब तो ऊँट खुद ही कह रहा हैं।”

चीता बोला  “महाराज! आपको संकोच हो तो हम इसे मार दें?”

 चीता व भेडिया एक साथ ऊँट पर टूट पडे और ऊँट मारा गया।

 सीखः चापलूसों की दोस्ती हमेशा खतरनाक होती हैं।

Wednesday, 12 September 2012

आफिस में पहला दिन और मेहनती संता !!

Archana Singh 2paltak - 19:47


संता सिंह की नई नौकरी लगी. पहले दिन संता ने बहुत देर तक काम किया. संता का बॉस उससे बहुत खुश हुआ.

बॉस : कल तुमने देर रात तक क्या किया ?

संता : कुछ नहीं बॉस कीबोर्ड में अल्फाबेट्स क्रम में नहीं थे, बस उसे ही ठीक कर रहा था.


संता और ओबामा साथ-साथ !!

Archana Singh 2paltak - 19:41


संता सिंह ओबामा की ओर से चुनाव में मदद कर रहे थे.

रास्ते में उनका ट्रक खराब हो गया. ओबामा ने ट्रक ले जाने के लिए एक दूसरे ट्रक की व्यवस्था की और ट्रक को खींचकर गैराज ले जाने लगे.

संता सिंह को ट्रक को जाते देख जोर-जोर से हंसने लगा.

ओबामा ने गुस्से में पूछा : कहीं तो पागल तो नहीं न हो गया.

बंता ने हंसते हुए जवाब दिया : ओए नहीं यार ! ऐसा पहले बार देखा है कि दो ट्रक मिलकर एक रस्सी को ले जा रहे हैं.

वर्ड वेरिफिकेशन क्या है और कैसे हटायें ?

Archana Singh 2paltak - 05:57
अक्सर पुराने blogger नए ब्लॉगरों को नसीहत देते हुए मिल जाते हैं कि भइया ये word verification हटा लीजिये, ताकि हम ब्लॉगरों को comments देने में आसानी रहे.

नया blogger परेशान.
वह सोच में पड़ जाता है -
भगवान्, ये कौन सी बला है !!
ये मैंने कौन सी गलती की, जो ये मुझे टोक रहे हैं !!

आइये जानें word verification (वर्ड वेरिफिकेशन) क्या है ?
जब हम ब्लॉगर या ब्लॉगस्पॉट (blogger या blogspot) पर ब्लॉग बनाते हैं तो यह word verification सभी के ब्लॉग में लगा रहता है. इससे यह समस्या होती है कि जब कोई comment देने के लिए आता है तो उसे कुछ अक्षरों को टाइप करना पड़ता है. यह नीचे इस चित्र में देखें.


यहाँ पर comment देने के साथ-साथ SSINERAC और 172 ये अक्षर टाइप करना पड़ेगा.


जो किसी को भी अच्छा नहीं लगता है.

word verification (शब्द सत्यापन) कैसे हटायें ?



इसे हटाने का तरीका बहुत ही आसान सा है,

इसके लिए आप अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड (dashboard) में जाएँ, फ़िर  सेटिंग्स
, फ़िर 'पोस्ट और टिप्पणियां' टैब में {शब्‍द सत्‍यापन दिखाएं ?} नीचे से तीसरा प्रश्न है ,
उसमें 'yes' पर tick है, उसे आप 'no' कर दें और फिर ऊपर दाहिने कोने का लाल बटन 'सेटिंग्स सहेजें' क्लिक कर दें. बस काम हो गया.



एक सज्जन ने mail किया है कि लोग कहते हैं कि वर्ड वेरिफिकेशन (word verification) हटाइये.

जब है ही नहीं तो कैसे हटायें !!

मज़ेदार सवाल है कि जो चीज़ है ही नहीं उसे कैसे हटायें. :)
दरअसल होता ये है कि जब हम अपने ही blog पर comment लिख रहे होते हैं तो वह हमें नहीं दिखाई पड़ता है, पर दूसरों के लिए उपस्थित होता है.

यदि आप log out करके अपने ही blog पर comment दें तो वह आपको भी दिखेगा.

Monday, 10 September 2012

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं

Archana Singh 2paltak - 15:22
  • Movie: Chor Machaye Shor
  • Singer(s): Kishore Kumar
  • Music Director: Ravindra Jain
  • Lyricist: Ravindra Jain
  • Actors/Actresses:
  • Year/Decade: 1974, 1970s

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में कभी उस पग में बँधता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह ...
कभी टूट गया कभी तोड़ा गया
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया
यूँ ही टूट-टूट के, फिर जुट-जुट के
बजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह ...
मैं करता रहा औरों की कही
मेरे मन की ये बात मन ही में रही
है ये कैसा गिला जिसने जो कहा
करता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह ...
अपनों में रहे या ग़ैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
कभी मन्दिर में कभी महफ़िल में
सजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह ...
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